हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मदरसा के शिक्षक हुज्जतुल इस्लाम मसऊद मोहम्मदी ने कहा कि तीसरे थोपे गए युद्ध के दौरान क्षेत्र के कई अरब देशों ने इस्लामी क्रांति का समर्थन करने के बजाय अमेरिका और उसके सहयोगियों का साथ दिया। उनका कहना था कि इस रुख से यह स्पष्ट हुआ कि ये देश स्वतंत्र नीति अपनाने के बजाय अमेरिकी नीतियों का अनुसरण कर रहे हैं, जो मुस्लिम जगत की एकता के लिए हानिकारक है।
उन्होंने कहा कि इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से ही अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान की व्यवस्था को कमजोर करने के प्रयास करते रहे। पहले उन्होंने देश के भीतर अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा दिया, लेकिन सफलता न मिलने पर उन्होंने इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का समर्थन कर ईरान के खिलाफ लंबा युद्ध छेड़ा।
मोहम्मदी ने कहा कि सद्दाम को विश्वास था कि वह बहुत कम समय में ईरान को पराजित कर देगा, लेकिन ईरानी जनता और सशस्त्र बलों के प्रतिरोध ने उसकी योजना को विफल कर दिया। उनके अनुसार, समय बीतने के साथ इराकी सेना की कमजोरियां सामने आती गईं और ईरानी लड़ाकों का मनोबल लगातार बढ़ता गया।
उन्होंने आगे कहा कि आठ वर्षीय युद्ध समाप्त होने के बाद भी विरोधी शक्तियों ने विभिन्न तरीकों से ईरान में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की, लेकिन जनता की जागरूकता और देशभक्ति के कारण उनके प्रयास सफल नहीं हो सके। उनके अनुसार, बाद में विरोधियों ने प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपनाया।
मोहम्मदी ने दावा किया कि इस संघर्ष में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और शीर्ष नेतृत्व के लोग शहीद हुए, लेकिन इससे ईरान की शक्ति कम होने के बजाय और मजबूत हुई। उन्होंने कहा कि आज ईरान की शक्ति के कारण अमेरिका को बातचीत की बात करनी पड़ रही है, जिसे उन्होंने उसकी रणनीतिक विफलता का संकेत बताया।
उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से कुछ अरब देशों ने इस्लामी क्रांति का समर्थन करने के बजाय विरोधी पक्ष का साथ दिया, जिससे मुस्लिम देशों की एकता को नुकसान पहुंचा।
अंत में उन्होंने आशा व्यक्त की कि अरब देश और उनकी जनता राजनीतिक परिस्थितियों का सही आकलन करेंगे, स्वतंत्र नीति अपनाएंगे और अमेरिका तथा इज़राइल के प्रति अपने रुख पर पुनर्विचार कर इस्लामी जगत की स्वतंत्रता और एकता को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाएंगे।
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